कर्मयोग karmyoga

कर्मयोग क्या है ?(What is karma yoga?)

Introduction And Importance Of Karma Yoga 

योग का वर्णन कई ग्रंथों ,पुराणों और उपनिषदों में हमें देखने को मिलता है ,योगविद्या के परिणामों की और देखकर आज हर कोई योग को अपने जीवन में स्थान दे रहा है। परन्तु ये योग है क्या ? योग व्यक्ति के मन वचन और मस्तिक्ष का एकत्रीकरण है। हर व्यक्ति के अनुसार योग को लेकर अलग अलग प्रकार के विचार ,मत या भ्रांतिया हो सकती है। परन्तु प्राचीन काल के नायक (अवतार),संत ,योगी इन्होने जनकल्याण के उद्देश्य से मनुष्य को योग का सही मार्गदर्शन कराया।
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कर्मयोग karmyoga
Karmyoga

 गीता के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण कहते है की 

  • " यदा यदा ही धर्मस्य ,ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमअधर्मस्य ,तदात्मानम सृज्याम्य्हम।
  • परित्राणाय साधूनां ,विनाशायच दुष्कृताम। धर्मसंस्थार्पनाथाय, सम्भवामि युगे युगे। 
  • अर्थात ,हे पार्थ जब जब भी इस धरती पर धर्म की हानि होती है  जब पाप का साम्राज्य बढ़ जाता है ,और मनुष्य धर्म का रास्ता छोड़ कर अधर्म के रास्ते को अपनाता है ,जब पापीजन ,पुण्यात्मा और साधुओं पर अत्याचार करते है ,जब ये धरती पाप के असहनीय बोझ को सहन नहीं कर पाती ,तब तब संत ,साधु और पुण्यात्माओं की रक्षा के लिए ,अधर्मियों का नाश करने और धर्म की स्थापना करने मैं हर युग में आता हूँ।  आया था। और आगे भी आता रहूँगा।  
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  • यानी जब जब मनुष्य को मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है ,तब तब कोई न कोई आता तो जरूर है चाहे वो यशोदा का लाल हो या बाल गोपाल ,चाहे वो दशरथनन्दन राम हो या राजाराम। चाहे वो ईसामसीह हो या फिर कोई साधू या संत। जहा जहा इन दिव्य शक्तियों की आवश्यकता होती है ,वह वह ये पहुंच ही जाती है। योग के कई प्रकार है ,उन्हीमें से कर्मयोग का बड़ा महत्व माना गया है। अब सवाल ये उठता है के आखिर ये कर्मयोग है क्या ? इसका जवाब भी इन्ही महापुरुषों ने दिया है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते है की " कर्मस कौशलं योगा "  या किसी भी काम को पूर्ण रूप से करना ही योग है ,जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य को कर्म करना ही पड़ता है ,चाहे वो कर्म करना चाहे या ना चाहे ,किसी ना किसी रूप में उसके द्वारा कर्म होता ही है। यदि मनुष्य अच्छा कर्म करता है तो उसे अच्छा ,और यदि बुरा कर्म करता है तो उसका फल भी उसे बुरा ही मिलता है। मै जो आगे बताने वाला हूँ  ,आपने कईबार उस बात का अनुभव अवश्य किया होगा। देखिये भगवान् कहते है की निष्काम कर्म करो यानी फल की इच्छा ना करते हुए ,आज की स्तिथि में जो तुम्हारा कर्तव्य है उसे निष्काम भाव से करते जाओ ,चाहे फल मिले या ना मिले। परन्तु आज हमें इसके विपरीत ही दिखाई देता है ,आजकल का मनुष्य प्राणी तो जैसे फल की इच्छा को छोड़ना ही नहीं चाहता ,इसके स्थान पर वो फल के पीछे भागता रहता है और अपना सम्पूर्ण जीवन गवा बैठता है ,उसके मन में एक पल के लिए भी ये विचार नहीं आता की मै आखिर क्या कर रहा हूँ ? और क्या कर रहा हूँ ? वो बस अपने ही धुन में लगा रहता है। पर कर्मयोग से हम सिख पाते है की अपने जीवन को धन्य कैसे बनाये ,कैसे हम अपने मन की आसक्ति को निकालकर निष्काम कर्म करते हुए प्रभु को कृपा प्राप्त कर सकते है।  जब हम किसी कार्य को आसक्ति या फलप्राप्ति की इच्छा से करते है ,तो हमारा मन हरसमय विचलित और अस्थिर रहता है। परन्तु जब मनुष्य निरासक्त भाव से किसी कार्य को करता है ,तो उसका मन स्थिर बना रहता है ,वो किसी भावनासे विचलित नहीं होता ,बस अपने कर्म को करना ही उसका धर्म बन जाता है ,वही कर्मयोगी कहलाता है।     
                                                                                                                                     Read more                                       
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