Ashtanga Yoga In Hindi Complete Guide

Ashtanga Yoga In Hindi Complete Guide इस दुनिया में बड़े बड़े योगी हुए ,जिन्होंने हमें योग की शिक्षा और परिणामों से अवगत कराया।  योग का अर्थ होता है जोड़ना , जो हमें ईश्वर से जोड़े उसे योग कहा गया है।  आत्मा और परमात्मा के बिच मिलन करानेवाली कड़ी को योग कहते है।  योग अगर मेरे और आपके जीवन में आ जाए तो बिगड़े काम भी आसानी से बन जाते है। योग जीवन जीने की शैली और मरने की कला है , जिसे मरना आ गया उसे जीने का तरीका भी अपने आप आ ही जाता है। जितना आपको इस बाहरी दुनियाँ में दिख रहा है चंद्र, सूर्य , तारे , गृह , नक्षत्र ,ये सारा ब्रम्हांड हमारे शरीर में ही है।  इस ब्रम्हांड से जुड़ने का तरीका ही योग कहलाता है। जो एक बार इससे जुड़ जाए, उसे किसी और से जुड़ने की आवश्यकता नहीं रहती।  जैसे जैसे समय बदलता गया , वैसे ही योग की परिभाषा भी बदलती गयी , कुछ भ्राँतिया उठने लगी ,   विचार बदलते गए पर योग जैसा था वैसा आज भी है। और हमें भी अब इससे जुड़ने की आवश्यकता है। योग की जानकारी देने के लिए कई ग्रंथ है जैसे पतंजलि , हठयोग प्रदीपिका, घेरंड संहिता , चरक संहिता , इन सबमे हमें योग का विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है। आज मै जिस योग की बात करनेवाला हूँ  , वो है अष्टांग योग जो सबसे लोकप्रिय होता जा रहा है। Ashtanga Yoga In Hindi को आप राज योग भी कह सकते है।


Ashtanga Yoga In Hindi - अष्टांग योग 

Ashtanga Yoga In Hindi - अष्टांग योग
Ashtanga Yoga 


राज यानि राजा , जैसे राजा स्वतंत्र ,आत्मनिर्भर , और आत्मविश्वासी होता है , वैसे ही राज योगी भी भयमुक्त , आत्मविश्वासी, साहसी , और शांति जैसे गुणों का स्वामी होता है। 

राज योग (Raja Yoga)यानि अष्टांग योग(Ashtang Yoga) को ८ भागो में वर्णित किया है। 


8 parts of Raj yoga Or Ashtang Yoga - अष्टांग योग के आठ अंग 



  1.  यम- संयमित जीवन 
  2.  नियम - योग के नियमो का पालन 
  3.  आसन- शारीरिक व्यायाम 
  4.  प्राणायाम - श्वासों का व्यायाम 
  5.  प्रत्याहार - दूसरों की संप्पत्ति पर ध्यान न देना 
  6.  धारणा - एकाग्रता शक्ति को बढ़ाना 
  7.  ध्यान - ध्यान साधकर अपने मन को वश में करना 
  8.  समाधी - पूर्ण आत्मानुभव होना 


इन ८ भागों के प्रत्येक भाग में अलग अलग सूचना का पालन करना पड़ता है। 



  • १ यम  - संयमित जीवन :- 


  1. अहिंसा - हिंसा न करना -  इस योग में हमें हिंसा करने से बचना होता है।  किसी जीवित प्राणी को मारना , कष्ट देना या किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाना ये सब बाते हिंसक प्रवृति को जन्म देती है। 
  2. सत्य - सत्य बोलना :- इस योग में हमारे स्वार्थ को त्यागकर केवल सत्य बोलना है ,कभी कभी किसी सत्य को छुपाने के लिए हम झूठ बोलते है और हमें लगता है की , किसीको ये बात पता नहीं चलेगी ,पर हम अपने अंदर बैठी आत्मा से कोई राज कैसे छुपा सकते है।  सत्य का अनुसरण करके ही ये योग सिद्ध होता है। 
  3. अस्तेय - चोरी ना करना -इस योग में व्यक्ति को दुसरो की चीज़े चाहे वो वस्तु हो या उसकी कोई कला , को चुराने से बचाना चाहिए। 
  4. ब्रम्हचर्य - शुद्ध आचरण ब्रम्हचर्य का अर्थ होता है ब्रम्ह के समान आचरण करने वाला।  इस योग में साधक को शारीरिक , मानसिक , शाब्दिक ब्रम्हचर्य का पालन करना चाहिए। 
  5. अपरिग्रह - आसक्त न होना -अपरिग्रह यानि अपनी सम्पूर्ण इच्छाओ का त्याग कर देना , जीवन जीने के लिए जीतनी वस्तुए आवश्यक है , उससे ज्यादा संग्रह ना करना।  किसी व्यक्ति या वास्तु में आसक्त न होना , अनासक्त जीवन जीना ही अपरिग्रह का पालन करना माना गया है। 


  • २ नियम -योग के नियमो का पालन करना :-


8 parts of Raj yoga Or Ashtang Yoga - अष्टांग योग के आठ अंग
Raj Yoga

  1. शौच - स्वच्छता- न की अपने बाहरी स्वच्छता अपितु आतंरिक स्वच्छता पर भी ध्यान देना।  इसमें न केवल कपडे , रूपरखाव , बल्कि आतंरिक गुण जैसे साधक के विचार उसकी भावनाये , अच्छी संगत पर ध्यान दिया जाता है। 
  2. संतोष - संतोषी बने रहना -आज भी हम अगर देखे तो समझ आ जाता है की, जो लोग असन्तोषी यानि असमाधानी होते है , चाहे उनके पास कितनी भी संपत्ति क्यों न हो , वो अपने जीवन में कभी सुखी नहीं हो पाते। इसलिए योग में संतोष को विशेष स्थान प्रदान किया है। जैसे अगर आप खाना खा रहे है , और द्वार पर एक भिकारी आ जाए।  और आपके पास उसे देने के लिए कुछ ना हो , फिर भी अगर आप खुद भूके रहकर उस व्यक्ति को अपनी रोटी दे देते है।  उस समय जो भावना आपके मन में उत्पन्न होती है , वही संतोष है। 
  3. तप - स्वयं पर संयम रखना -अपने आप को  नियंत्रित रख  , अपने मन को विभिन्न प्रकार के विचारो से हटाकर संयमित रखना ही तप कहलाता है। 
  4. स्वाध्याय - अभ्यास करना -रोजाना वेदो और शास्त्रों को पढ़ना , भगवत गीता का अध्ययन करना , योगशिक्षा हेतु हठयोग प्रदीपिका , पतंजलि योग सूत्र जैसी पुस्तकों का अभ्यास कर, अपने योग ज्ञान को बढ़ाना ही स्वाध्याय है।  साधक को हर रोज स्वाध्याय करते रहना चाहिए। 
  5. ईश्वर प्रणिधान - ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा रखना -व्यक्ति हररोज नई नई चिंताओं से परेशान हो जाता है , इसलिए ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा रखकर अपने आप को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देना ही ईश्वर प्रणिधान है। 




  • ३ आसन - शारीरिक व्यायाम 
  1. योग के इस चरण में साधक हो अलग -अलग प्रकार के आसन करके शारीरिक रूप से मजबूत बनाया जाता है।  इससे शरीर के अंदर की बीमारियां दूर होकर ,साधक आगे आनेवाले चरणों के लिए तैयार हो  जाता है।



  • ४ प्राणायाम - श्वासों का व्यायाम 


  1. कपालभाति , अनुलोम विलोम , नाड़ीशोधन जैसे प्राणायामों का नित्य अभ्यास कर साधक के अंदर प्राणशक्ति को उजागर किया जाता है और मानसिक रूप से मजबूत किया जाता है। 




  • ५ प्रत्याहार - दुसरो की संपत्ति पर ध्यान न देना 


  1. इस चरण में साधक अपने मन को बाहरी वस्तुओं से हटाकर  पूरी तरह अपनी आत्मा में लीन रहने का प्रयत्न करता है।  अगर ये योग साधक सिद्ध कर ले तो वो जब चाहे अपने मन को किसी भी स्थान पर एकत्रित कर सकता है। 







  1. धारणा योग में साधक अपना मन अपने विचारो , भावनाओं और बाहरी दुनिया से हटाकर किसी एक स्थान पर लगाने का अभ्यास करता है।  इस योग के लिए वो त्राटक (एक जगह पर बिना पालक झपकाए ध्यान लगाना ) जैसी क्रियाओ का अभ्यास करता है। 






  1. इसमें साधक को ध्यान लगाने का अभ्यास कराया जाता है।  ध्यान लगाना यानि नींद लेने की प्रक्रिया नहीं है , नींद तब आती है जब हमारे शरीर और दिमाग को थकावट होती है , पर ध्यान तभी लगता है जब हमारा दिमाग शांत हो , उसमे कुछ विचार न हो।  ध्यान सत्यता तक पहुंचने की विधि है , ना की कल्पनाये करने की , विविध प्रकार की कल्पनाये करके ध्यान कभी सार्थक नहीं होता।  उसके लिए मन का शांत होना अति आवश्यक है। 




  • समाधी - पूर्ण आत्मानुभव होना 


  1. समाधि योग का आखरी चरण है।  समाधी लगने पर साधक को पूर्ण समता प्राप्त हो जाती है। उसके लिए सब एकसमान हो जाता।  उसे कुछ भी जाननेके लिए शेष नहीं रह जाता और ना ही कुछ पाने के लिए।  उसे शास्वत आनंद की प्राप्ति हो जाती है।  समाधि का आनंद तो वही जानता है जिसने समाधी लगायी हो।  उसका वर्णन तो कोई शाब्दिक रूप से कर ही नहीं सकता।  उसके लिए अनुभव लेना आवश्यक है।  



इस लेख में आपने "Ashtanga Yoga In Hindi" के बारे में जानकारी पढ़ी। अष्टांग योग या राज योग का जो मुख्य सारांश है ,वही आपतक पहुंचाने का प्रयास किया है।  
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